प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन विद्वान भवते नातिवादी ।
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा - नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥
- मुन्डकोपनिषद ३-१-४
यह परमेश्वर ही प्राण है जो सब प्राणियों के द्वारा प्रकाशित हो रहा है । इसको जाननेवाला ज्ञानी अभिमानपूर्वक बढ बढ कर बातें करने वाला नही होता । वह आत्मस्वरूप में क्रीडा करता हुआ और आत्मा में ही रमण करता हुआ , ब्रह्म्वेत्ताओं में भी श्रेष्ठ होता है ।
पाश्चात्य संस्कृति में जो व्यक्ति के अपने प्रस्तुतीकरण पे इतना जोर है , उसके विरोध में भारतीये साहित्य जहाँ तहां जीवन के उद्देश्य को निराव्लम्ब बनाने की सलाह देता है। जब व्यक्ति अपने अन्तर से ही उपजा , अपने अन्तर में ही जीता है, तो अपने सत्य को बाँटने के लिए वह इतना प्रयासरत क्यों है?

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