Thursday, August 27, 2009

राधा ही क्यों?

आख़िर राधा नाम में ऐसा क्या है?

तुलसी कहते हिं,
राम न सकहिं नाम गुण गाहीं ।
राम समर्थ नही हैं स्वयं अपने ही नाम के प्रभाव को गाने में।

नाम नामी से अधिक प्रभावी होता है।
नामी का स्वरुप नही है,
नाम नामी को अस्तित्व देता है,
पहचान देता है।
नाम के बिना नामी में केवल 'हैपना' है,
वह बस केवल 'है'।
उसका कोई स्वरुप नही है।
नाम नामी से बड़ा है,
क्योंकि नामी नाम के पीछे है,
नामी नाम पर आधारित है,
और नाम को नामी की ज़रूरत नही है।
नाम नामी के बिना रह सकता है।
नामी को नाम के पीछे आना ही होगा।
'राम' शब्द में ही राम हैं।
'राम' से परे कोई राम हो भी तो,
'राम' को उसकी परवाह नही।

एक और बात।
'राम' शब्द है।
शब्द द्योतक है।
एक आकार है।
उस शब्द के परिचायक का।
शब्द स्वयं नही है 'वह',
परिचय है,
जल में पड़ते सूरज के प्रतिबिब जैसा,
शब्द सूरज नही है,
प्रतिबिम्ब है,
जल में बना हुआ।
और प्रतिबिम्ब में जल का योगदान है,
सूरज से बाद कर,
जो अपने स्वरुप में सूरज को स्थान देता है,
अपने अस्तित्व की पहचान से अधिक,
सूरज के अस्तित्व को महत्व देता है।
तो सूरज का प्रतिबिम्ब जल पर निर्भर है।
और जल सूरज के होनेपन हो स्वरुप देता है।
तो शब्द 'सूरज' , सूरज के अलावा,
जल पर भी निर्भर है, अपने स्वरुप के लिए।
अन्तर है जलाशयों में।
अन्तर है हृदयों में,
जो शब्द को धारण करते हैं।
शब्द चाहे जिसका भी द्योतक हो,
शब्द अपनी पहचान रखता है,
और उसका स्वरूप,
अपने द्योतक से अधिक,
अपने धारक पर निर्भर करता है।
हर स्थिति में शब्द अपने द्योतक का ही होता है,
मगर अपने स्वरुप के लिए अपने धारक पर निर्भर करता है।
शब्द का अस्तित्व,
अपने द्योतक से अधिक विशाल होता है,
प्रति क्षण परिवर्तनिये और वर्द्ध्मान होता है।
'राम', राम से अधिक,
'राधा', राधा से बढकर,
प्रभाव में विस्तार होता है।

मगर प्रश्न है की फिर 'राधा' ही क्यों?

आराधना में भी राध शब्द है।

Monday, August 3, 2009

राधे!
आज फिर तुम याद आयी,
आज फिर खोया मैंने खुद को ,
और खूब रोया हितच्कियों के साथ।
तुम्हारी याद नही,
तुम्हे भूलने जाने का ज्ञान रुलाता है।
आज फिर तुम याद आई,
और बहुत देर तक रोया मैं।

माँ हो तुम, प्रियतमा भी,
पुत्री हो तुम, आत्मा भी।
नही द्वंद्व है अब तुम्हे लेकर की कौन हो तुम,
अब बस संघर्ष है अपनी आँखों और मन के बीच,
अभी भी आँख देख नही पाती है जो मन में बैठ चुका है।
तुम्हारी सूरत अभी भी नज़र नही आती,
हालाँकि मन जानता है तुम यही हो,
हर कहीं हो।

मैं रोना चाहता हूँ,
अब रोना बुरा नही लगता,
यूँ ही याद आया करो,
और मुझे रुलाया करो,
की अब दुनिया में इससे अच्छा कुछ भी नही लगता।

राधे!
और अब मैं तुम्हारा नाम ले तुम्हे पुकारना भी नही चाहता,
पता नही कहीं से संकोच आता है तुम्हारे नाम के जीभ पर लाने में,
और यहाँ तक की कुछ कहना भी अच्छा नही लगता,
न शास्त्र, न संसार।
न मेरे होनेपन का अहसास ,

बस याद,
संपूर्ण अहसास,
और सब कुछ भूलना,
चाहता है मन मेरा,
मेरी आंखों को भी अब सजीव करो,
की वह मन का साथ दे,
और तुम्हारे होने के अहसास में न अब कहीं कोई और व्यवधान हो॥