भरद्वाज पुत्र सुकेशा आदि भगवन पिप्लाद से प्रश्न करने के उद्देश्य से उनके पास गए। उनके मन की बात समझ कर ऋषि पिप्लाद ने कहा-
....तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्य्थ यथाकामं प्र्श्नान्पृच्छ्त यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ।
प्रश्नोपनिषद १-२
तुम लोग श्रद्धा के साथ तपस्या करते हुए एक वर्ष यहाँ रहो, तब तुम्हारे इच्छानुसार पूछे हुए प्रश्न का उत्तर यदि मैं जानता होऊंगा तो सब तुम्हे बताऊंगा।
कठोपनिषद की तरह ही यहाँ भी ज्ञान के अधिकारी होने की आवश्कता की तरफ़ इशारा हैं। मगर यहाँ की बात थोडी और गुढ़ हैं। वहाँ यमराज थे , उन्हें केवल अधिकारित्व का ज्ञान करना था । यहाँ ऋषि हैं, तो अधिकारित्व के प्रकट करने की भी जिम्मेवारी हैं। देवता सिर्फ़ परीक्षा ले सकते हैं। गुरु तैयारी भी कराते हैं । ऋषि गुरु की भूमिका में हैं। पहले प्रश्कर्ता में उत्तर को धारण कर सकने की क्षमता को पैदा करना हैं। अतएव एक वर्ष का समय माँगा है । एक वर्ष तक क्या करना है? तपस्या! तपस्या माने क्या? पतंजल योगदर्शन कहता है। धर्म के लिए कष्ट सहने का नाम ही तपस्या है।
तो तपस्या माने कष्ट सहना है ? हाँ! मगर कष्ट के लिए कष्ट नही सहना है । किसी इच्छा विशेस की पूर्ति के कष्ट नही सहना है , जैसे टॉप करने के लिए पड़ रहे हों। बल्कि धर्म पालन के लिए कष्ट सहना है। जैसे पड़ना मेरा धर्म है इसलिए पड़ रहे हैं, प्रथम आना की इच्छा के लिए कष्ट नही सह रहे।
फिर इसका मतलब है की धर्म पालन में कष्ट होता है । यदि नही होता तो फिर तपस्या शब्द ही नही होता । ध्रामचरण में कष्ट होता है। और उसी कष्ट को सहने से पात्रता आती है ब्रह्मज्ञान की। यदि कष्ट अपनी इच्छापूर्ति के लिए सहा तो वह कष्ट इच्छा की पूर्ति कर के समाप्त हो जाएगा। परन्तु यदि कष्ट कर्ताया कर्म के नाते , स्वधर्म के नाते सहा तो उस करमा का फल तो मिलेगा पर उसमे जीव लिप्त नही होगा । और उस तपस्या के परिणामस्वरूप वह ब्रह्मज्ञान, स्थितप्रज्ञता का अधिकारी भी बन सकेगा। तो पिप्लाद ऋषि ने तपस्या करने को कहा।
मगर एक और शर्त रखी । की तपस्या श्रद्धा पूर्वक करनी होगी। कृष्ण कहते हैं - श्रद्धावान लभते ज्ञानं। श्रद्धा पर इतना जोर क्यों है ? कार्य तो वही हो रहा है। चाहे श्रद्धा से करो या यूं ही, यंत्रवत । जैसे रोज सुबह हनुमान चालीसा पढ़ना है सो पढ लिया। अब श्रद्धा कहाँ से लायें?
तो धर्म के लिए कष्ट सहना है मगर यंत्रवत नही, श्रद्धा के साथ। तब अधिकारी होंगे ब्रह्मज्ञान सम्बन्धी पूछने के।
और सिर्फ़ श्रद्धा पूर्वक धर्माचरण करते हुए कष्ट सहना ही पर्याप्त नही है। ब्रह्मचर्य का पालन भी करना होगा। एक वर्ष तक के लिए। यदि इच्छाओं का मकरजाल ह्रदय को घेरे रहेगा तो ज्ञान की कुण्डलिनी अवरुद्ध ही नही होगी उसके अनियंत्रित हो जाने का डर भी रहेगा। ज्ञान सामर्थ्य उत्पन्न करता हैं। और विवेक के अभाव में सामर्थ्य अपना नुकसान ही कर सकता है। विवेक के दृढ़ रहने के लिए विचारों को निर्विकल्प बनाना होगा। ब्रह्मचर्य किसी क्रिया का निरोध नही हैं। ब्रह्मचर्य आचरण की एक पद्धति हैं। निरोध में शक्ति क्षय होती हैं, आचरण में शक्ति को सदिश करते हैं। आचरण दिशा देती हैं शक्ति के प्रवाह को। निरोध क्षय हैं, आचरण उनयन हैं। तो ब्रह्मचर्य का आचरण करने को कहा ऋषि पिप्लाद ने।
और यह नही कहा की उत्तर देंगे। बड़ा सुंदर vakya है। यदि मेरे सामर्थ्य में हुआ तो उत्तर देंगे ! बहुत मर्म छुपा है इस उत्तर men । ब्रह्म के सन्दर्भ में nischaya से उत्तर देने का dambh ही brahgyan का अभाव है। naichyanusandhan ही जीव का sarvopari सामर्थ्य है।
हिन्दी lekhan अभी भी सहज नही है॥ कभी कभी ब्लॉगर atak jata है...
sesh फिर कभी
हरे कृष्ण!
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1 comment:
यूँ ही ज्ञान की बातें लिखते रहे... ब्लॉग जगत पर भले भटक आयें लेकिन आपके ये पोस्ट तो श्रद्धा से पढ़ते ही हैं... लिखते रहे.
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