उपनिषदों ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है । नही की वे प्रमाणिक ग्रन्थ है भारतीये दर्शन के, बल्कि यूं की जितनी सटीक और सारगर्भित व्याख्याएँ ब्रह्म की, उपनिषदों में मिल जाती है वे अन्य ग्रंथों में सुलभ नही है।
नचिकेता के यमराज से प्रश्नों के उत्तर में यमराज का ब्रह्मज्ञान की महत्ता और उसकी प्राप्ति का साधन ही कठोपनिषद का विषय है।
पहले तो यमराज नचिकेता को ब्रह्म ज्ञान के अलावा अन्य किसी भी वस्तु का लालच देते है और अडिग रह जाने पे नचिकेता को इस ज्ञान का अधिकारी पाते है।
यह बड़े महत्व की बात है । अधिकारी निरूपण शंकराचार्य ने भी अपने कैवल्यचूड़ामणी में विशेष रूप से वर्णित किया है। अधिकारी होना किसी ज्ञान के लिए भारतीये दार्शनिक परम्पराओं में आवश्यक था।
अधिकारी माने क्या? और ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी... माने जीव का सर्वोच्च सामर्थ्य। माने उसे इस ज्ञान से नीचे की किसी भी वस्तु में उसका राग नही रह गया है। इससे जानने वाले का भी कल्याण है और ज्ञान ही महत्ता भी नष्ट नही होगी । स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने एक जगह विवेकानन्द को फटकारा है, एक अनधिकारी शिष्य को ज्ञान देने का प्रयास करते देख कर। उनका तर्क था की इससे विवेकानन्द जी ने उस शिष्य की हो सकने वाली वृद्धि को कुंठित कर दिया है।
सम्भव है इस घटना को एक दसवीं के विद्यार्थी को स्नातक का पाठ पढाने जैसा समझा जाए..इससे न सिर्फ़ उसके के न समझ पाने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है अपितु एक भय भी बन सकता है उसके मन में उतरोतर ज्ञान के प्रति । भय उसके सम्यक विकास में बाधक भी बन सकता है। अतएव अधिकारी निरूपण पहली आवश्यकता है अध्यात्मिक ज्ञान की।
नचिकेता की परीक्षा लेने के लिए यमराज उसे विविध प्रकार के भोगों का प्रलोभन देते है। आश्चर्य है, इन प्रलोभनों की चर्चा हर सिद्धांत, हर दर्शन, हर धर्मशास्त्र में आई है। मार का आक्रमण बुद्ध पर हुआ था, कुण्डलिनी तंत्र में योगिनियों की चर्चा आती है। याने अधिकारी निरूपण की एक प्रक्रिया है कि निचले स्तर के सुखों में यदि साधक का मन रम जाए तो अभी वह ऊपर के ज्ञान के लिए उपलब्ध नही हुआ है।
नचिकेता का मन किसी प्रलोभन में नही फंसा, उसे तो केवल और केवल ब्रह्मज्ञान चाहिए था। यही शर्त है ब्रह्मज्ञान की, यही शर्त है प्रेम की। जब तक किसी भी अन्य में आकर्षण है, प्रेम की प्राप्ति नही हो सकती। कृष्ण कहते है... 'माम एकं शरणं व्रज' ॥ केवल एक मेरी शरण में आ जाओ । 'एक मेरी शरण' , माने पूर्ण समर्पण। थोडी सी भी शक की गुन्जाइश न हो। यह नही की मुझे यह भी चाहिए और वह भी... केवल एक की इच्छा हो तभी वह प्राप्त हो सकता है। नचिकेता को केवल ब्रह्म ज्ञान ही चाहिए था...
तब यमराज नचिकेता को ब्रह्मज्ञान का स्वरूप समझाते है...
न नेरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः।
अनन्यप्रोक्ते gati gatiratra naasti aniyan hyatarkyamanupramanat .. (not getting transliterated)
यह ज्ञान अल्पज्ञ मनुष्यों के समझाने से नही आ सकता चाहे कितना भी चिंतन क्यों न किया जाए। और यह किसी महँ ज्ञानी से भी केवल सुन भर लेने से समझ में नही आ सकता।
बड़ा सुंदर वर्णन है । केवल सुनना की काफ़ी नही है और नही सुने बिना काम भी नही चल सकता। अपने आत्मा की भूमिं उर्वर हो और उसपर समर्थ गुरु के शब्दों का बीज गिरे तभी एक फलवान वृक्ष की कमाना सार्थक हो सकती है।
शेष फिर कभी ....
हरे कृष्ण!
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1 comment:
अच्छी व्याख्या की आपने... नचिकेता की कहानी स्कूल में पढी, कठोपनिषद नहीं पढ़ पाया अभी तक... ट्रांसलेशन में दिक्कत हो तो लिपिकार (www.lipikaar.com) इस्तेमाल कर लें, कलिष्ठ शब्दों के लिए अच्छा है.
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