Thursday, June 5, 2008

सत्संग महिमा

मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥
सो सब जानब सत्संग प्रभाऊ । लोकहुँ वेद न आन उपाऊ ।।
राम चरित मानस , बालकाण्ड , २-3
अच्छी बुद्धि , यश , सद्गति और सांसारिक सुख, जिस किसी ने जहाँ कहीं भी पाया है उसे सत्संग का ही प्रभाव जानना चाहिए ।
मानस के हंस स्वामी तुलसी दास ने इतनी दृढ़ता से सभी सांसारिक और पारमार्थिक सुखों का मूल सत्संग को बताया है कि तर्क करने वाले कि बुद्धि भी एक क्षण को स्तम्भित हो जाए ।

पुनः कहते हैं :
बिनु सत्संग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।।
सत्संगत मुद मंगल मूला । सोई फल सिधि सब साधन फुला ।।

तुलसी के राम जीव का उद्देश्य भी हैं और मार्ग भी । तुलसी के राम सत्संग के दाता भी हैं और सत्संग के उद्देश्य भी । वेदान्तिकों कि भांति ब्रह्म केवल साधन के दूसरे छोर पे एक पुरस्कार के रूप में इंतज़ार नही करता बल्कि वह सहयोग करता है अपने तक पहुँचने में और प्राप्ति के पश्चात वह पुनः जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाता है, कौसल्या के राम कि तरह या नन्द के लाल कि तरह। और जीवन का उद्देश्य सत्संग कि प्राप्ति बन जाता है जिसमे राम सहयोगी बन जाते हैं न कि अंत। राम के प्रसन्न होने से सत्संग कि प्राप्ति होगी और सत्संग के मिलने से सभी मंगलों कि प्राप्ति। तभी तो साक्षात् भगवान शंकर मांगते हैं श्री राम से -

बार बार बर मांगऊँ हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सत्संग ।।
राम चरित मानस , उत्तर काण्ड , १४ ।
मैं बार बार आपसे मांगता हूँ। एक बार नही। ऐसा नही कि देना हो तो दो नही तो मत दो। वस्तु का मूल्य ही इतना है कि बार बार मांगना ही उचित है। मांगी गई वस्तु क्या है? भक्ति और सत्संग । साक्षात् परमात्मा सामने हो और मांगने वाले कि बुद्धि स्वयं आदिगुरु शंकर कि हो तो देखिये मांगी गयी वस्तु क्या है ! यहाँ देने वाले के सामर्थ्य और मांगने वाले कि बुद्धि पर विचार किया जाए तो मांगी गयी वस्तु के महत्व का ज्ञान होता है । इतनी महत्ता सत्संग कि मानी गई है ।

2 comments:

Abhishek Ojha said...

धन्यवाद आपकी विस्तृत टिपण्णी के लिए. ये जानकर कर खुशी हुई की आपकी धर्म में भी रूचि हैं. यहाँ कुछ देखें... अभी थोड़ा व्यस्त हूँ बाद में टिपण्णी करता हूँ: http://ojha-uwaach.blogspot.com/search/label/Religion

Abhishek Ojha said...

मानस जैसा कोई काव्य नहीं इसमें कोई संसय नहीं, अगर उपदेश की बात छोड़ भी दें तो काव्य सौन्दर्य अतुलनीय है. और उपदेशों का तो कहना ही क्या !