Tuesday, June 24, 2008

आज फिर भटका मन मेरा, आज फिर किसी ने आवाज़ दी।
कृष्ण ने झकझोर उठाया, आज फिर कृष्ण ने याद की ॥
जब जब घना कोहरा जिंदगी के गिर्द, मन को बेचैन करता है।
कृष्ण तू सहज ही आकर मुझे फिर-फिर संभाल लेता है ॥

Friday, June 13, 2008

प्रश्नोपनिषद से

भरद्वाज पुत्र सुकेशा आदि भगवन पिप्लाद से प्रश्न करने के उद्देश्य से उनके पास गए। उनके मन की बात समझ कर ऋषि पिप्लाद ने कहा-
....तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्य्थ यथाकामं प्र्श्नान्पृच्छ्त यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति
प्रश्नोपनिषद १-२
तुम लोग श्रद्धा के साथ तपस्या करते हुए एक वर्ष यहाँ रहो, तब तुम्हारे इच्छानुसार पूछे हुए प्रश्न का उत्तर यदि मैं जानता होऊंगा तो सब तुम्हे बताऊंगा।
कठोपनिषद की तरह ही यहाँ भी ज्ञान के अधिकारी होने की आवश्कता की तरफ़ इशारा हैं। मगर यहाँ की बात थोडी और गुढ़ हैं। वहाँ यमराज थे , उन्हें केवल अधिकारित्व का ज्ञान करना था । यहाँ ऋषि हैं, तो अधिकारित्व के प्रकट करने की भी जिम्मेवारी हैं। देवता सिर्फ़ परीक्षा ले सकते हैं। गुरु तैयारी भी कराते हैं । ऋषि गुरु की भूमिका में हैं। पहले प्रश्कर्ता में उत्तर को धारण कर सकने की क्षमता को पैदा करना हैं। अतएव एक वर्ष का समय माँगा है । एक वर्ष तक क्या करना है? तपस्या! तपस्या माने क्या? पतंजल योगदर्शन कहता है। धर्म के लिए कष्ट सहने का नाम ही तपस्या है।
तो तपस्या माने कष्ट सहना है ? हाँ! मगर कष्ट के लिए कष्ट नही सहना है । किसी इच्छा विशेस की पूर्ति के कष्ट नही सहना है , जैसे टॉप करने के लिए पड़ रहे हों। बल्कि धर्म पालन के लिए कष्ट सहना है। जैसे पड़ना मेरा धर्म है इसलिए पड़ रहे हैं, प्रथम आना की इच्छा के लिए कष्ट नही सह रहे।
फिर इसका मतलब है की धर्म पालन में कष्ट होता है । यदि नही होता तो फिर तपस्या शब्द ही नही होता । ध्रामचरण में कष्ट होता है। और उसी कष्ट को सहने से पात्रता आती है ब्रह्मज्ञान की। यदि कष्ट अपनी इच्छापूर्ति के लिए सहा तो वह कष्ट इच्छा की पूर्ति कर के समाप्त हो जाएगा। परन्तु यदि कष्ट कर्ताया कर्म के नाते , स्वधर्म के नाते सहा तो उस करमा का फल तो मिलेगा पर उसमे जीव लिप्त नही होगा । और उस तपस्या के परिणामस्वरूप वह ब्रह्मज्ञान, स्थितप्रज्ञता का अधिकारी भी बन सकेगा। तो पिप्लाद ऋषि ने तपस्या करने को कहा।
मगर एक और शर्त रखी । की तपस्या श्रद्धा पूर्वक करनी होगी। कृष्ण कहते हैं - श्रद्धावान लभते ज्ञानं। श्रद्धा पर इतना जोर क्यों है ? कार्य तो वही हो रहा है। चाहे श्रद्धा से करो या यूं ही, यंत्रवत । जैसे रोज सुबह हनुमान चालीसा पढ़ना है सो पढ लिया। अब श्रद्धा कहाँ से लायें?
तो धर्म के लिए कष्ट सहना है मगर यंत्रवत नही, श्रद्धा के साथ। तब अधिकारी होंगे ब्रह्मज्ञान सम्बन्धी पूछने के।
और सिर्फ़ श्रद्धा पूर्वक धर्माचरण करते हुए कष्ट सहना ही पर्याप्त नही है। ब्रह्मचर्य का पालन भी करना होगा। एक वर्ष तक के लिए। यदि इच्छाओं का मकरजाल ह्रदय को घेरे रहेगा तो ज्ञान की कुण्डलिनी अवरुद्ध ही नही होगी उसके अनियंत्रित हो जाने का डर भी रहेगा। ज्ञान सामर्थ्य उत्पन्न करता हैं। और विवेक के अभाव में सामर्थ्य अपना नुकसान ही कर सकता है। विवेक के दृढ़ रहने के लिए विचारों को निर्विकल्प बनाना होगा। ब्रह्मचर्य किसी क्रिया का निरोध नही हैं। ब्रह्मचर्य आचरण की एक पद्धति हैं। निरोध में शक्ति क्षय होती हैं, आचरण में शक्ति को सदिश करते हैं। आचरण दिशा देती हैं शक्ति के प्रवाह को। निरोध क्षय हैं, आचरण उनयन हैं। तो ब्रह्मचर्य का आचरण करने को कहा ऋषि पिप्लाद ने।
और यह नही कहा की उत्तर देंगे। बड़ा सुंदर vakya है। यदि मेरे सामर्थ्य में हुआ तो उत्तर देंगे ! बहुत मर्म छुपा है इस उत्तर men । ब्रह्म के सन्दर्भ में nischaya से उत्तर देने का dambh ही brahgyan का अभाव है। naichyanusandhan ही जीव का sarvopari सामर्थ्य है।
हिन्दी lekhan अभी भी सहज नही है॥ कभी कभी ब्लॉगर atak jata है...
sesh फिर कभी
हरे कृष्ण!

Sunday, June 8, 2008

भरताग्रज

श्री राम और भरत के संबंधों से क्या कोई और सम्बन्ध प्रगाढ़ हो सकता है? तभी तो प्रभु श्री राम अपने को भरताग्रज कहे जाने पर सबसे अधिक प्रसन्न होते हैं। देवता भी भरत के चरणों की शरण लेते हैं जब उनको भगवान् श्री राम से कोई कार्य साधना होता है।

जो प्रयागराज से धर्म अर्थ और काम नही मांगते । कहते हैं कि हर जन्म में सीता राम के चरणों की सेवा देना। यदि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो भरत भक्तोत्तम, जीवोत्तम हैं । हमारे आराध्य तो भरत ही हो सकते हैं। क्यों कि श्री राम जिसको पाकर प्रसन्न हों उसे पाकर कौन प्रसन्न नही होगा।

Saturday, June 7, 2008

कठोपनिषद से

उपनिषदों ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है । नही की वे प्रमाणिक ग्रन्थ है भारतीये दर्शन के, बल्कि यूं की जितनी सटीक और सारगर्भित व्याख्याएँ ब्रह्म की, उपनिषदों में मिल जाती है वे अन्य ग्रंथों में सुलभ नही है।
नचिकेता के यमराज से प्रश्नों के उत्तर में यमराज का ब्रह्मज्ञान की महत्ता और उसकी प्राप्ति का साधन ही कठोपनिषद का विषय है।
पहले तो यमराज नचिकेता को ब्रह्म ज्ञान के अलावा अन्य किसी भी वस्तु का लालच देते है और अडिग रह जाने पे नचिकेता को इस ज्ञान का अधिकारी पाते है।
यह बड़े महत्व की बात है । अधिकारी निरूपण शंकराचार्य ने भी अपने कैवल्यचूड़ामणी में विशेष रूप से वर्णित किया है। अधिकारी होना किसी ज्ञान के लिए भारतीये दार्शनिक परम्पराओं में आवश्यक था।
अधिकारी माने क्या? और ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी... माने जीव का सर्वोच्च सामर्थ्य। माने उसे इस ज्ञान से नीचे की किसी भी वस्तु में उसका राग नही रह गया है। इससे जानने वाले का भी कल्याण है और ज्ञान ही महत्ता भी नष्ट नही होगी । स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने एक जगह विवेकानन्द को फटकारा है, एक अनधिकारी शिष्य को ज्ञान देने का प्रयास करते देख कर। उनका तर्क था की इससे विवेकानन्द जी ने उस शिष्य की हो सकने वाली वृद्धि को कुंठित कर दिया है।
सम्भव है इस घटना को एक दसवीं के विद्यार्थी को स्नातक का पाठ पढाने जैसा समझा जाए..इससे न सिर्फ़ उसके के न समझ पाने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है अपितु एक भय भी बन सकता है उसके मन में उतरोतर ज्ञान के प्रति । भय उसके सम्यक विकास में बाधक भी बन सकता है। अतएव अधिकारी निरूपण पहली आवश्यकता है अध्यात्मिक ज्ञान की।
नचिकेता की परीक्षा लेने के लिए यमराज उसे विविध प्रकार के भोगों का प्रलोभन देते है। आश्चर्य है, इन प्रलोभनों की चर्चा हर सिद्धांत, हर दर्शन, हर धर्मशास्त्र में आई है। मार का आक्रमण बुद्ध पर हुआ था, कुण्डलिनी तंत्र में योगिनियों की चर्चा आती है। याने अधिकारी निरूपण की एक प्रक्रिया है कि निचले स्तर के सुखों में यदि साधक का मन रम जाए तो अभी वह ऊपर के ज्ञान के लिए उपलब्ध नही हुआ है।
नचिकेता का मन किसी प्रलोभन में नही फंसा, उसे तो केवल और केवल ब्रह्मज्ञान चाहिए था। यही शर्त है ब्रह्मज्ञान की, यही शर्त है प्रेम की। जब तक किसी भी अन्य में आकर्षण है, प्रेम की प्राप्ति नही हो सकती। कृष्ण कहते है... 'माम एकं शरणं व्रज' ॥ केवल एक मेरी शरण में आ जाओ । 'एक मेरी शरण' , माने पूर्ण समर्पण। थोडी सी भी शक की गुन्जाइश न हो। यह नही की मुझे यह भी चाहिए और वह भी... केवल एक की इच्छा हो तभी वह प्राप्त हो सकता है। नचिकेता को केवल ब्रह्म ज्ञान ही चाहिए था...
तब यमराज नचिकेता को ब्रह्मज्ञान का स्वरूप समझाते है...
न नेरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः।
अनन्यप्रोक्ते gati gatiratra naasti aniyan hyatarkyamanupramanat .. (not getting transliterated)
यह ज्ञान अल्पज्ञ मनुष्यों के समझाने से नही आ सकता चाहे कितना भी चिंतन क्यों न किया जाए। और यह किसी महँ ज्ञानी से भी केवल सुन भर लेने से समझ में नही आ सकता।
बड़ा सुंदर वर्णन है । केवल सुनना की काफ़ी नही है और नही सुने बिना काम भी नही चल सकता। अपने आत्मा की भूमिं उर्वर हो और उसपर समर्थ गुरु के शब्दों का बीज गिरे तभी एक फलवान वृक्ष की कमाना सार्थक हो सकती है।
शेष फिर कभी ....
हरे कृष्ण!

Thursday, June 5, 2008

सत्संग महिमा

मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥
सो सब जानब सत्संग प्रभाऊ । लोकहुँ वेद न आन उपाऊ ।।
राम चरित मानस , बालकाण्ड , २-3
अच्छी बुद्धि , यश , सद्गति और सांसारिक सुख, जिस किसी ने जहाँ कहीं भी पाया है उसे सत्संग का ही प्रभाव जानना चाहिए ।
मानस के हंस स्वामी तुलसी दास ने इतनी दृढ़ता से सभी सांसारिक और पारमार्थिक सुखों का मूल सत्संग को बताया है कि तर्क करने वाले कि बुद्धि भी एक क्षण को स्तम्भित हो जाए ।

पुनः कहते हैं :
बिनु सत्संग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।।
सत्संगत मुद मंगल मूला । सोई फल सिधि सब साधन फुला ।।

तुलसी के राम जीव का उद्देश्य भी हैं और मार्ग भी । तुलसी के राम सत्संग के दाता भी हैं और सत्संग के उद्देश्य भी । वेदान्तिकों कि भांति ब्रह्म केवल साधन के दूसरे छोर पे एक पुरस्कार के रूप में इंतज़ार नही करता बल्कि वह सहयोग करता है अपने तक पहुँचने में और प्राप्ति के पश्चात वह पुनः जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाता है, कौसल्या के राम कि तरह या नन्द के लाल कि तरह। और जीवन का उद्देश्य सत्संग कि प्राप्ति बन जाता है जिसमे राम सहयोगी बन जाते हैं न कि अंत। राम के प्रसन्न होने से सत्संग कि प्राप्ति होगी और सत्संग के मिलने से सभी मंगलों कि प्राप्ति। तभी तो साक्षात् भगवान शंकर मांगते हैं श्री राम से -

बार बार बर मांगऊँ हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सत्संग ।।
राम चरित मानस , उत्तर काण्ड , १४ ।
मैं बार बार आपसे मांगता हूँ। एक बार नही। ऐसा नही कि देना हो तो दो नही तो मत दो। वस्तु का मूल्य ही इतना है कि बार बार मांगना ही उचित है। मांगी गई वस्तु क्या है? भक्ति और सत्संग । साक्षात् परमात्मा सामने हो और मांगने वाले कि बुद्धि स्वयं आदिगुरु शंकर कि हो तो देखिये मांगी गयी वस्तु क्या है ! यहाँ देने वाले के सामर्थ्य और मांगने वाले कि बुद्धि पर विचार किया जाए तो मांगी गयी वस्तु के महत्व का ज्ञान होता है । इतनी महत्ता सत्संग कि मानी गई है ।

Wednesday, June 4, 2008

हरे कृष्ण

हरे कृष्ण, हरे कृष्ण , कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
प्रेम के सागर से कृष्ण, सारी दुनिया भरे भरे।

हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे ।
तुम्ही से बस प्रेम, सारी दुनिया करे करे ।

Monday, June 2, 2008

सत्य का बोध और अभिव्यक्ति

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन विद्वान भवते नातिवादी ।

आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा - नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥

- मुन्डकोपनिषद ३-१-४

यह परमेश्वर ही प्राण है जो सब प्राणियों के द्वारा प्रकाशित हो रहा है । इसको जाननेवाला ज्ञानी अभिमानपूर्वक बढ बढ कर बातें करने वाला नही होता । वह आत्मस्वरूप में क्रीडा करता हुआ और आत्मा में ही रमण करता हुआ , ब्रह्म्वेत्ताओं में भी श्रेष्ठ होता है ।
पाश्चात्य संस्कृति में जो व्यक्ति के अपने प्रस्तुतीकरण पे इतना जोर है , उसके विरोध में भारतीये साहित्य जहाँ तहां जीवन के उद्देश्य को निराव्लम्ब बनाने की सलाह देता है। जब व्यक्ति अपने अन्तर से ही उपजा , अपने अन्तर में ही जीता है, तो अपने सत्य को बाँटने के लिए वह इतना प्रयासरत क्यों है?

कृष्ण के प्रति शब्दों की सीमाएं

कृष्ण शब्द की ताकत से परे हैं
मन की ताकत से परे है... शब्द वाक् के अधीन है, वह मन के अधीन और मन बुद्धि के अधीन।
कृष्ण बुद्धि से परे है।
कृष्ण आत्मा से परे है ...बुद्धि जीवात्मा के अधीन है और जीवात्मा माया के अधीन।
कृष्ण माया से परे है।
जीव की क्षमता अपनी आत्मा तक है, कृष्ण आत्मा से परे है। वह माया से भी परे है।
तब शब्द की ताकत कितनी सीमित है यह सहज लक्षित है ।

किंतु शब्द सबसे अधिक गढे गए हैं कृष्ण के बखान में।
सबसे सुंदर शब्द ! सबसे विचित्र और आकर्षक सब्द।
क्योंकि शब्दों की महत्ता ही है कृष्ण के प्रति अपने सकल सामर्थ्य के उपयोग में। जैसे जीव की महत्ता है कृष्ण के प्रति अपनी शक्ति और सामर्थ्य के समर्पण में।

शब्द जीव की शक्ति के अधीन है। और जीव के प्रयास कृष्ण के प्रति विशेष।
तो शब्दों से कृष्ण के प्रति प्रयास जीव का विशेष समर्पण और सामर्थ्य भी है और आनंद भी।

शब्द अधूरे हैं क्यों की शब्दों की न आंखे हैं और न कान ।
न वे कृष्ण को देख सकते हैं न सुन सकते हैं।
फिर कृष्ण के प्रति वे क्या कहेंगे ।
मगर मन शब्दों का सहारा के अनुभवों का विस्तार कर सकता है इसलिए शब्दों की महत्ता है।

सभी धर्मंग्रंथ शब्दों के सहारे मन को परम पुरूष की ओर इंगित करने का प्रयास करते हैं।
इसमें मन का ही मुख्य काम होता है , मगर शब्द उसके दिखने तक भरोसे का काम भी करते हैं और प्रेरणा का भी। और उसके दिखने के बाद यही शब्द उसके मनोरंजन के साधन बन जाते हैं।

तो शब्द सीमित हैं , अक्षम हैं... मगर शब्द साधन हैं।
शब्दों का सिलसिला कृष्ण बनाये रखें..... हरे कृष्ण

हरे कृष्ण

यह जो मेरी कृष्ण की इबादत है,

यह उसी कृष्ण की मुझ पे इनायत है।

वरना यह ज़िंदगी क्या है

पैदा होने से मरने तक की कवायद है।