Sunday, June 8, 2008

भरताग्रज

श्री राम और भरत के संबंधों से क्या कोई और सम्बन्ध प्रगाढ़ हो सकता है? तभी तो प्रभु श्री राम अपने को भरताग्रज कहे जाने पर सबसे अधिक प्रसन्न होते हैं। देवता भी भरत के चरणों की शरण लेते हैं जब उनको भगवान् श्री राम से कोई कार्य साधना होता है।

जो प्रयागराज से धर्म अर्थ और काम नही मांगते । कहते हैं कि हर जन्म में सीता राम के चरणों की सेवा देना। यदि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो भरत भक्तोत्तम, जीवोत्तम हैं । हमारे आराध्य तो भरत ही हो सकते हैं। क्यों कि श्री राम जिसको पाकर प्रसन्न हों उसे पाकर कौन प्रसन्न नही होगा।

1 comment:

Abhishek Ojha said...

जी हाँ, भरत का भ्रात्रिप्रेम अतुलनीय है, ऐसे प्रेम के उदाहरण कम ही मिलते हैं.... परशुराम का पिता के प्रति और भरत का राम के प्रति.
हनुमान के लिए रामजी ने कहा: तुम मम प्रिय भरत सम भाई !
भरत के लिए वशिष्ठजी ने नामकरण करते हुए कहा: ”विश्व भरण पोषण कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई।