कृष्ण शब्द की ताकत से परे हैं ।
मन की ताकत से परे है... शब्द वाक् के अधीन है, वह मन के अधीन और मन बुद्धि के अधीन।
कृष्ण बुद्धि से परे है।
कृष्ण आत्मा से परे है ...बुद्धि जीवात्मा के अधीन है और जीवात्मा माया के अधीन।
कृष्ण माया से परे है।
जीव की क्षमता अपनी आत्मा तक है, कृष्ण आत्मा से परे है। वह माया से भी परे है।
तब शब्द की ताकत कितनी सीमित है यह सहज लक्षित है ।
किंतु शब्द सबसे अधिक गढे गए हैं कृष्ण के बखान में।
सबसे सुंदर शब्द ! सबसे विचित्र और आकर्षक सब्द।
क्योंकि शब्दों की महत्ता ही है कृष्ण के प्रति अपने सकल सामर्थ्य के उपयोग में। जैसे जीव की महत्ता है कृष्ण के प्रति अपनी शक्ति और सामर्थ्य के समर्पण में।
शब्द जीव की शक्ति के अधीन है। और जीव के प्रयास कृष्ण के प्रति विशेष।
तो शब्दों से कृष्ण के प्रति प्रयास जीव का विशेष समर्पण और सामर्थ्य भी है और आनंद भी।
शब्द अधूरे हैं क्यों की शब्दों की न आंखे हैं और न कान ।
न वे कृष्ण को देख सकते हैं न सुन सकते हैं।
फिर कृष्ण के प्रति वे क्या कहेंगे ।
मगर मन शब्दों का सहारा के अनुभवों का विस्तार कर सकता है इसलिए शब्दों की महत्ता है।
सभी धर्मंग्रंथ शब्दों के सहारे मन को परम पुरूष की ओर इंगित करने का प्रयास करते हैं।
इसमें मन का ही मुख्य काम होता है , मगर शब्द उसके दिखने तक भरोसे का काम भी करते हैं और प्रेरणा का भी। और उसके दिखने के बाद यही शब्द उसके मनोरंजन के साधन बन जाते हैं।
तो शब्द सीमित हैं , अक्षम हैं... मगर शब्द साधन हैं।
शब्दों का सिलसिला कृष्ण बनाये रखें..... हरे कृष्ण
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