Monday, August 3, 2009

राधे!
आज फिर तुम याद आयी,
आज फिर खोया मैंने खुद को ,
और खूब रोया हितच्कियों के साथ।
तुम्हारी याद नही,
तुम्हे भूलने जाने का ज्ञान रुलाता है।
आज फिर तुम याद आई,
और बहुत देर तक रोया मैं।

माँ हो तुम, प्रियतमा भी,
पुत्री हो तुम, आत्मा भी।
नही द्वंद्व है अब तुम्हे लेकर की कौन हो तुम,
अब बस संघर्ष है अपनी आँखों और मन के बीच,
अभी भी आँख देख नही पाती है जो मन में बैठ चुका है।
तुम्हारी सूरत अभी भी नज़र नही आती,
हालाँकि मन जानता है तुम यही हो,
हर कहीं हो।

मैं रोना चाहता हूँ,
अब रोना बुरा नही लगता,
यूँ ही याद आया करो,
और मुझे रुलाया करो,
की अब दुनिया में इससे अच्छा कुछ भी नही लगता।

राधे!
और अब मैं तुम्हारा नाम ले तुम्हे पुकारना भी नही चाहता,
पता नही कहीं से संकोच आता है तुम्हारे नाम के जीभ पर लाने में,
और यहाँ तक की कुछ कहना भी अच्छा नही लगता,
न शास्त्र, न संसार।
न मेरे होनेपन का अहसास ,

बस याद,
संपूर्ण अहसास,
और सब कुछ भूलना,
चाहता है मन मेरा,
मेरी आंखों को भी अब सजीव करो,
की वह मन का साथ दे,
और तुम्हारे होने के अहसास में न अब कहीं कोई और व्यवधान हो॥

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